भारतीय समाज का तानाबाना
न्योता भी और न्योछावर भी : पारस्परिक प्रेम और स्वामित्व का भाव
भारतीय परिवारों के साथ पूरे समाज का आपसी संबंधों का जाल विन्यास का धागा जुड़ाव, संवाद, तालमेल से बहुत मजबूती से बंधा हुआ है, परिवारों में होने वाली प्रत्येक परंपरा छोटी बड़ी सुख-दुख की घड़ी में व्यक्ति का सामाजिक जीवन के प्रति अधिक निकटता समाज के माध्यम से जन समर्पित होती है, समय के साथ बहते-बहते समाज ने शहरों में प्रचलित सभी व्यवस्थाओं को शाश्वत मानते हुए उन्हें बिना किसी भेदभाव के स्वीकार करना प्रारंभ कर दिया, जबकि दोनों समाजो की सामाजिक व्यवस्था और रचना अलग अलग थी, ये विषय देश के समाज शाश्त्रियों के मंथन का था, मेरा मानना है कि इस परिवर्तन के व्यापक और दूरगामी परिणामों से समाज का आपस में जुड़ाव, संवाद, तालमेल, सब क्षीण होता गया और उसका आकार समाज की इकाई से परिवार और परिवार से व्यक्ति तक सीमित हो गया ।
भारतीय समाज की सोच हमेशा बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की रही है। हमारी आज की पीढ़ी साधन संपन्न होने से सभी उत्सव, त्योहारों, संस्कारों जैसे विवाह आदि को एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी के माध्यम से आयोजित करने लगी है क्योंकि शहरों में समाज का ताना बाना छिन्न-भिन्न हो चुका है, शहर के समाज में बाजारवाद और पूंजीवाद ने इतनी गहरी पैठ बना ली है कि यहाँ सभी व्यवस्था व्यक्ति निष्ठ हो गई है; अन्य समाज के प्रति जुड़ाव से मीलों दूर निकल गई है, “डिग्निटी ऑफ़ लेबर“ विमर्श ने हमारी ज़िंदगी को एक नई दिशा में ला कर खड़ा कर दिया है; जहाँ सिर्फ़ कंपीटिशन है कोलैबोरेशन नही, खैर यहाँ ये सभी विषय इसलिए ज़रूरी है कि हम एक क्षण रुककर; कुछ समय के चक्र को पीछे लें और जरा सोचें । भारत में दो प्रकार के समाज रहते है, गाँव तथा शहरों का समाज, दोनो समाजों के बीच में मानव और समाज कल्याण के उच्च प्रतिमान का अन्तर कम होता गया, में एक के बाद एक उदाहरण देकर आप सबका ध्यान हमारी मजबूत विरासत की और आकर्षित करना चाहता हूँ, घर में होने वाले छोटे से छोटे संस्कार का उदाहरण लेते है, घर में विवाह का आयोजन है: वर वधु की जानकारी: एक परिवार का दूसरे परिवार से परिचय नहीं होने की स्थिति में ब्रह्मण के द्वारा दोनों परिवारों की सामाजिक प्रतिष्ठा एवम सम्मान और आर्थिक स्थिति की समीक्षा कर प्रस्ताव भेजना तथा जानकारी उपलब्ध कराना, क्योंकि ब्राह्मण कर्मकांड के निमित्त शहर, गाँव में प्रवास करते थे एवम परिवारों को दो से अधिक पीढ़ी के जानकार होने से दोनों घरों के जीवन मूल्यों की जानकारी होती थी । इस तरह की शास्त्र संवत् समाज सेवा करना तथा इस कार्य के उपरांत जीवन यापन करने के लिए उचित मानदेय (दक्षिणा) प्राप्त होता था, इस तरह से विवाह के प्रस्ताव के माध्यम से विवाह करने पर परिवार के जीवन मूल्य में वृद्धि होती थी । (सजेशन -१) जन्म पत्रिका का मिलान एक वैज्ञानिक शोध से प्राप्त जानकारी के अनुसार ये शरीर विज्ञान का मिलान है। इसके बाद परिवारों की वित्तीय स्थिति के अनुसार वर और वधु पक्ष की अपेक्षाओं को सीमित करना तथा संस्कारों को प्राथमिकता देना चाहिए ऐसा ज्ञान संवर्धन कर समाज से आर्थिक विषमता को मिटाना एक कार्य था, आज आधुनिक समाज जिसको “जेन – जी” कहा जा रहा है, ने पश्चिम के समाज के मापदंडो को समाज के बड़े सामर्थ्य वाले लोंगो को देखकर साश्वत सत्य मानकर अपनी जीवन की प्राथमिकता बदल दी.
एक और उदहारण से आप भारतीय समाज के ताने बाने की समर्थ समझ जायेंगे, शादी के बाद नवविवाहित जोड़े को पूरे समाज में भोजन के लिए बुलाया जाता था जिस से वे अतिथि सत्कार प्रत्येक परिवार की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं जीवन मूल्यों के प्रति उनका विश्वास समझ में आता है, ये कुटुम्भ प्रबोधन का सबसे अच्छा उदहारण है, परिवार में जा कर भोजन करना ये अवसर होता है जानने का की भविष्य में उनके प्रति आस्था का भाव दृण हो सके, पहली विदाई सिर्फ एक हफ्ते के अंदर वो भी पति के साथ कम से कम सात या आठ दिन के लिए, ताकि वधु पक्ष के सामाजिक जन भोजन पर आमंत्रित कर सके और नवविवाहित को सम्पर्कित समाज की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं जीवन मूल्यों के प्रति उनका विश्वास समझ में आता है, ये दोनो पक्षों में समरसता एवं समन्वय का भाव निर्माण करने में सहायक होता है, साथ ही वर वधु भी एक दूसरे के अहंकार को भी साधने में सहायक होते थे, अब हम शहरो में होने वाले विवाह में अनुपस्थित इस सांस्कृतिक मिलन को आप उन बातो से समझ सकते है जिन से वर्तमान में वैवाहिक समस्याएं विकराल रूप ले रही है – छोटी छोटी बातों पर तलाक– (सम्बन्ध विच्छेद ), परिवारों के अन्य सदस्यों के प्रति आदर/ सम्मान का भाव कम होना, जैसे छोटे से उदाहरण भोजन का बनाना, परोसना, बस इन दो उदाहरण से आप अंदाजा लगा लेतें है कि अतिथि सत्कार तो दूर घर के सदस्यों को सम्मान से भोजन मिल जाये तो गनीमत समझिये, मेरा मतलब सभी मातृ शक्तियों के बारे में बुरा बोलना नहीं है, लेकिन ये समस्या का कारण क्या है ये जानना महत्वपूर्ण है, तभी हम इस के निदान के प्रति सचेत हो सकते है, समाज से आज अतिथि सत्कार, जिसको हम आतिथ्य का भाव कहते हैं, लगभग समाप्त सा लगता है, घर आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को पानी और साथ में कुछ खाने के लिए देना प्रेम/ आदर का भाव है, ये लगभग समाप्त है, उल्टा ये बोलना शुरू हो गया है कि ये इसका काम है, लेकिन दूसरा पक्ष और भयानक है, अपराधियों के द्वारा पानी मांगने के नाम पर बुजुर्ग लोगों पर हमला करना, इससे धन हानि कम हुई, लेकिन समाज से विश्वास धीरे धीरे ख़त्म हो गया है.
आज पानी मांगने पर भी शहरों में नहीं मिलेगा, इसलिए शहर और गाँव का समाज अलग अलग परिवेशों में आज भी है, और हम शहरों में प्रतिस्प्रधा में जी रहे है, क्यों, क्योंकि हमने अपने आप सीमित अवसरों को ही लक्ष्य मान लिया, और आपस में प्रतिस्प्रधा में लग गए, जबकि सभी की काबिलियत अलग अलग है, मछ्ली पेड़ पर नहीं चढ़ सकती, उसको तैरने का काम देना होगा, ये कहने से नहीं, काम देने वालो को बताना पड़ेगा, यहाँ गुरु का महत्व शुरु होता है , वो कक्षा में आने वाले प्रत्येक छात्र की जन्म से प्राप्त काबिलियत को निखार के उस विषय में या करतल विद्या में निपुण कर समाज उपयोगी छत्रों का निर्माण करता था, आज हम इसको ही मार्किट ड्रिवेन इकोनोमी और मार्किट ड्रिवेन जॉब रोल कहते है, गुरु केवल पाठ्यपुस्तक तक सीमित नहीं थे, राज्यों (राष्ट्र) की आवश्यकता के अनुसार शिक्षा और पद्धति में परिवर्तन कर राष्ट्र उपयोगी श्रेष्ठ छात्रों का निर्माण करना ही गुरुकुल का दायित्व था, आज के परिवेश में भारत की विशालता और विस्तार को देखते हुए, शिक्षा में राष्ट्र की प्राथमिकता ये हमारी सरकार के दृष्टी पत्र में आना चाहिए, जैसे आने वाले समय में चिकित्सा , सुरक्षा , विज्ञानं, अनुसन्धान , जैसे विषयों पर अखिल भारतीय इस्तर की समिति हो जो प्रतेक वर्ष सरकार द्वारा पोषित संसाधनों का उपयोग किस होना है ये तय कर सके , शिक्षा की पध्धिती इस्थायी न होकर चलायामन हो , तर्क संगत हो, तथा समयानुकूल , यौगानुकुल हो , क्यों की अभी जनरेटिव ऐ आई – आ गया है , ये हमरे जैसे राष्ट्रों के विषय में एक स्ट्रेटेजिक टूल के रूप में है, इस तर्क का कारण है, हम तकनीकी में पराश्रित राष्ट्र है.
गूगल का स्थान मोबाइल की दुनिया में ज्ञान का ग्राम देवता से शुरू किया था,अब कुल देवता भी हो गया है क्यों की हमें कहीं भी जाना हो, जाने का मार्ग भी उसी से पूछते है, तो हुआ न कुल देवता, अभी वो मोबाइल की दुनिया में राष्ट्र देवता हो गया है, क्योंकि सारा मोबाइल एप प्ले स्टोर पर ही तो है न, तो हुआ न राष्ट्र देवता बात हो रही थी Generative AI की, ये हमारी यात्रा ( भारत की) का बहुत महत्व पूर्ण पड़ाव है, क्योंकि हम ने ७० वर्ष लगा दिए उपनिवेशक मानसिकता को समाज से दूर करने में, दिमाग को विचार एवं पद्धति से मुक्त करने में, भारत की आत्मा और उसकी ज्ञान परंपरा को जीवित करने में, ये एक स्वाभिमान की वापसी का पड़ाव है, ये परम वैभव की और जाने की सुनिश्चिता है, कि हम सही दिशा में जा रहे है, ज्ञान की परंपरा पे गर्व करके, नए युगानुकुल, समयानुकूल, साहित्य, इतिहास का निर्माण कर रहे है, तथा नयी पीढ़ी को हमने इस से जोड़ा भी है, लेकिन अभी पाठ्यक्रमों में आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता है, पद्धति में मूल तत्व को वापस लाने की आवश्यकता है, जहाँ प्रतिस्पर्धा नहीं प्रतीक रूप में स्पर्धा हो, आपस में competition नहीं cooperation हो, लेकिन इस मोड़ पर इस चुनौती का सामना कैसे करना है, भारत इस चुनौती में फिर से अगर तकनीकी रूप से आश्रित रह गया तो, क्या हो सकता है इस पर विचार करके हम सोचें कि क्या हम पुनः उपनिवेशक मानसिकता का शिकार हो सकते हैं, अभी ऐसा लगता नहीं है? पर ऐसा है क्योंकि नॉलेज ट्रान्सफर का हमारे पास अपना कोई डिजिटल प्लेटफार्म नहीं है, इसलिए लार्ज लैंग्वेज मॉडल में जो जानकारी सुरक्षित होगी, वही आगे आने वाले समय में उपयोगकर्ताओं को Generative AI में आएगी, इस का सीधा सीधा सम्बन्ध साहित्य का प्रकाशन ही नहीं अपितु तथ्य की सच्चाई के ऑनलाइन उपलब्ध हो जिस से लार्ज लैंग्वेज मॉडल के स्पाइडर भारतीय उपमहादीप से जानकारी को एकत्रित करे तो उन्हें यह जानकारी मिले, लेकिन उस Generative AI में guard rail या misinformation को बनाया जा सकता है, वही या उस को बदल कर भी दिखाई जा सकती है, क्योंकि यह संस्कृति एवं विचार पर आधारित राष्ट्र की पहचान का महतवपूर्ण बिंदु है,
रिसर्च और स्किल सेट अनुसार जॉब रोल. विवाह में दहेज़ सामग्री देना एक सामाजिक आर्थिक व्यवस्था का सुद्रीकरण का प्रमाण था , सभी जॉब रोल को व्यवसाय की व्यवस्था , पारिवारिक जीवन में प्रवेश कर रहे वर -वधू को सहायता का भाव था , लेकिन कुरूतियोने इसका विकृत स्वरुप समाज को दे दिया , सामाजिक ताना -बना बिखर गया , जनरेशन के बदलने पर इन सभी जानकारियों को अगली पीड़ी को नॉलेज ट्रान्सफर नहीं किया गया . इसलिए आज पांच सितारा होटल में बच्चो के लिए दूध खरीदना पड़ता है , सड़क किनारे के होटल में बच्चो के दूध के पैसे नहीं लिए जाते
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